Journal of Social Review and Development
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<p><strong>Journal of Social Review and Development</strong> is an international, peer-reviewed, refereed, and open-access journal, which publishes works from a wide range of fields, including anthropology, criminology, economics, education, geography, history, law, linguistics, political science, psychology, social policy, social work, sociology, humanities, social science, philosophy, international relations, public administration, social welfare, religious studies, visual arts, women studies, development studies, library and information science, linguistics, and so on.</p>Dzarc Publicationsen-USJournal of Social Review and Development2583-2816विकसित भारत की संकल्पना में प्राचीन व्यापार का वैशिष्ट्य
https://www.dzarc.com/social/article/view/1074
<p>किसी भी सभ्यता की बुनियाद उसकी आर्थिक संरचना होती है। समाज का निरन्तर विकास एक सुदृढ़ अर्थव्यवस्था पर निर्भर करता है इसीलिए प्राचीन भारत में प्रचलित पुरुषार्थ सिद्धान्त में ‘अर्थ’ को महत्व दिया गया था। प्राचीन काल में ‘अर्थ’ को अर्जित के प्रमुख साधनों में व्यापार भी शामिल था। आधुनिक युग में भी समाज को विकसित करने में व्यापार की भूमिका अत्यंत आवश्यक होती है। भारत को 2047 तक विकसित करने में व्यापार सर्वाधिक महत्वपूर्ण आयाम सिद्ध होगा। व्यापार से देश का आर्थिक तंत्र मजबूत होता है। प्राचीन भारत के व्यापारिक अनुभवों को आत्मसात करके नवीन व्यापारिक तंत्र की मूर्त संकल्पना कर सकते हैं। भारत के आयात-निर्यात एवं व्यापार संतुलन को निर्धारित करके देश के व्यापार को समृद्ध किया जा सकता है। प्राचीन भारत के व्यापार में कई समयांतरालों भारत का व्यापार संतुलन सकारात्मक रहा है और प्राचीन भारत में विभिन्न वस्तुओं का उत्पादन एवं निर्यात कर बहुत सा धन अर्जित किया जाता था। रोम से होने वाले व्यापार में भारत को वहाँ से हर वर्ष 55 करोड़ सेस्टर्स की प्राप्ति होती थी। मसाले, हीरे, इस्पात, वस्त्र आदि निर्यात प्रमुख वस्तुएँ थीं। रोम प्रतिवर्ष भारत की विलासिता सामग्री मँगाने पर 10 करोड़ सेस्टर्स व्यय करता था तथा अपने स्वर्ण से भुगतान करता था। ‘प्लिनी’ भारत की ओर इस स्वर्ण प्रवाह देखकर दुःख प्रकट करता है। इस प्रकार के व्यापार में प्राचीन भारत में व्यापार को अत्यंत लाभदायक बनाया था। अतः आधुनिक समय में भी अन्य देशों की आवश्यकतानुसार वस्तुओं का उत्पादन कर व्यापार में अच्छा लाभ अर्जित किया जा सकता था।</p>सपना जायसवाल
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3010310.64171/JSRD.5.S3.1-3चीन और पाकिस्तान के साथ भारत की सुरक्षा चिन्ताओं का एक राजनैतिक तुलनात्मक
https://www.dzarc.com/social/article/view/1075
<p>राजनैतिक विश्लेष्कों के अनुसार चीन और पाकिस्तान दोनों ही राष्ट्र शुरू से ही भारत को अपना चिर विरोधी और प्रतिद्वन्दी राष्ट्र मानते रहे हैं, चाहे प्रश्न आर्थिक स्तर पर हो या सामाजिक। भारत अपनी स्वतंत्रता के बाद से समय-समय पर विशेष प्रयास करता रहा है कि दोनों ही राष्ट्रों से सम्बंध मधुर बने रहे लेकिन कभी सीमा विवाद तो कभी आतंकवाद जैसी समस्याऐं भारत के समक्ष हमेशा आती रही हैं कई बार चीन और पाकिस्तान भारत को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कमतर दिखाने के लिए एक साथ खड़े होते हुये भी नजर आये हैं। इन्हीं सब कारणों से भारत की सुरक्षा चिन्ताऐं इन दोनों ही राष्ट्रों के प्रति बढ़ जाती है।<br>भारत अपने पड़ौसी राष्ट्रों के साथ सामरिक, व्यापारिक, रणनीतिक और साझेदारी नीतियों में साॅफ्ट नीति व मैत्रीभाव को अपनाता है वहीं बात करे यदि चीन और पाकिस्तान की तो वह अपने पड़ौसी राष्ट्रों के साथ विरोधी नीति और हार्ड नीति अपनाते है। इस शोध पत्र के माध्यम से भारत और चीन के मध्य सीमा विवाद, सैन्यीकरण और सामरिक समस्याओं का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है। शोध पत्र में चीन-पाकिस्तान गठजोड से भारत की बढ़ती सुरक्षा चिन्ताओं का राजनैतिक विश्लेष्णात्मक अध्ययन किया गया है।</p>अंजू आर्य
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3040710.64171/JSRD.5.S3.4-7सतत विकासोन्मुख शिक्षक शिक्षा में स्वदेशी ज्ञान प्रणालियाँ, पाठ्यचर्या नवाचार एवं डिजिटल एकीकरणः एक समावेशी दृष्टिकोण
https://www.dzarc.com/social/article/view/1076
<p>यह शोध-लेख स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को सतत विकास के लिए शिक्षा के साथ समेकित करने की संभावनाओं, औचित्य और शैक्षिक निहितार्थों का विश्लेषण करता है। अध्ययन का केंद्रीय तर्क यह है कि शिक्षक शिक्षा को केवल ज्ञान-संप्रेषण की प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक रूप से जड़ित, अनुभवात्मक, अंतर्विषयक और भविष्य-उन्मुख निर्माण-प्रक्रिया के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 तथा राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखादृविद्यालयी शिक्षा 2023 जैसे दस्तावेजों में स्थानीय संदर्भ, बहुविषयक अधिगम, मातृभाषा-आधारित शिक्षा और अनुभवात्मक शिक्षण पर बल दिया गया है, जो स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों दृसतत विकास के लिए शिक्षा समन्वय के लिए सशक्त आधार प्रदान करते हैं। उत्तराखंड जैसे हिमालयी क्षेत्र में पारंपरिक कृषि, जल-संरक्षण, वन-प्रबंधन, लोक-परंपराएँ, औषधीय ज्ञान और सामुदायिक जीवन-सरणियाँ शिक्षा के लिए जीवंत संसाधन हैं। अध्ययन यह भी दर्शाता है कि डिजिटल एकीकरण, आईसीटी और ज्ञान के डिजिटलीकरण के माध्यम से स्थानीय ज्ञान को संरक्षित, सुलभ और शिक्षण-अधिगम के लिए अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है। साथ ही, यह लेख शिक्षक तैयारी, पाठ्यचर्या पुनर्संरचना, समावेशिता, मूल्य-आधारित शिक्षा तथा नीति-क्रियान्वयन की चुनौतियों पर भी प्रकाश डालता है। निष्कर्षतः, स्वदेशी ज्ञान, सतत विकास के लिए शिक्षा और डिजिटल एकीकरण का समन्वय एक ऐसे शिक्षक निर्माण की ओर संकेत करता है जो सांस्कृतिक रूप से उत्तरदायी, पर्यावरण-सचेत, तकनीकी रूप से सक्षम और सामाजिक रूप से प्रतिबद्ध हो।<br>यह शोध-लेख स्वदेशी ज्ञान प्रणालियों को सतत विकास के लिए शिक्षा (सतत विकास के लिए शिक्षा) के साथ समेकित करके शिक्षक शिक्षा को अधिक समावेशी, संदर्भानुकूल और परिवर्तनकारी बनाने की संभावना का विश्लेषण करता है। अध्ययन का केंद्रीय तर्क यह है कि शिक्षा केवल पाठ्य-पुस्तकीय ज्ञान के संप्रेषण तक सीमित न रहकर स्थानीय जीवन, सांस्कृतिक विरासत, पर्यावरणीय संवेदनशीलता और सामुदायिक अनुभवों से जुड़ी होनी चाहिए।</p>दिनेश कुमारतरूण कुमार
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3081210.64171/JSRD.5.S3.8-12डिजिटल युग में भारतीय ज्ञान प्रणालीः सोशल मीडिया पर विश्वसनीयता, चुनौतियाँ एवं शैक्षिक संभावनाएँ
https://www.dzarc.com/social/article/view/1077
<p>वर्तमान डिजिटल परिप्रेक्ष्य में सोशल मीडिया ज्ञान-विनिमय, विचार-संप्रेषण और सांस्कृतिक संवाद का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा है, जिसके द्वारा भारतीय ज्ञान प्रणाली में निहित प्राचीन दर्शन, पारंपरिक विज्ञान, लोकज्ञान, आयुर्वेद, योग तथा प्रकृति-आधारित जीवन दृष्टि व्यापक जनसमूह तक पहुँच रही है। इस अध्ययन का उद्देश्य सोशल मीडिया पर उपलब्ध भारतीय ज्ञान प्रणाली -संबंधित सामग्री की विश्वसनीयता, उससे जुड़ी चुनौतियों तथा उसकी शैक्षिक उपयोगिता का सम्यक् विश्लेषण करना है। यद्यपि सोशल मीडिया ने ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया को तीव्र गति प्रदान की है, तथापि अपूर्ण, संदर्भहीन अथवा अप्रमाणित जानकारी का तीव्र प्रसार वास्तविक ज्ञान की अवधारणा को प्रभावित करता है। तथ्य-जांच की कमी, एल्गोरिथ्म-आधारित प्रसार प्रणाली तथा व्यावसायिक दृष्टिकोण से निर्मित सामग्री इस क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ हैं, जिनके कारण शिक्षार्थियों के लिए सत्य और असत्य के मध्य भेद करना जटिल हो जाता है। इसके बावजूद, यदि शैक्षणिक संस्थान, विशेषज्ञ एवं शोधकर्ता प्रमाणिक स्रोतों पर आधारित सामग्री का निर्माण एवं प्रसार करें, तो सोशल मीडिया भारतीय ज्ञान प्रणाली के शैक्षिक संवर्धन का प्रभावी साधन सिद्ध हो सकता है, जो संवादात्मक अधिगम, दृश्य-श्रव्य सामग्री तथा वैश्विक स्तर पर ज्ञान-साझाकरण के अवसर प्रदान करता है। निष्कर्षत यह आवश्यक है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली की गरिमा एवं प्रामाणिकता बनाए रखने हेतु डिजिटल नैतिकता, मीडिया साक्षरता तथा अकादमिक सत्यापन की प्रक्रियाओं को सुदृढ़ किया जाए, जिससे सोशल मीडिया विश्वसनीय एवं शिक्षणोपयोगी मंच के रूप में विकसित हो सके।</p>राजश्री पुरसेठ
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3131910.64171/JSRD.5.S3.13-19उत्तराखंड के परंपरागत ताम्रशिल्पकरो पर आधुनिकता का प्रभाव
https://www.dzarc.com/social/article/view/1078
<p>भारतीय सामाजिक व्यवस्था में व्यवसाय को परंपरागत रूप से पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी व्यावसायिक परंपराओं के रूप में आगे बढ़ाया गया लेकिन धीरे-धीरे परिवर्तन की क्रांति की शुरुआत में इन परंपरागत व्यवसाययों पर अपना प्रभाव डाला और धीरे-धीरे उनकी पहचान पर संकट गहराने लगा उत्तराखंड में शिल्प के परंपरागत कार्य के आधार पर अपनी पहचान बनाने वाले लोगों को शिल्पकार कहा जाता है किंतु आज यह शिल्पी आधुनिकीकरण एवं नगरीकरण के फल स्वरुप अपनी पहचान के संकट से गुजर रहे हैं प्रस्तुत लेख के अंतर्गत उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के अल्मोड़ा शहर में विलुप्त होती परंपरागत ताम्र शिल्प कला पर आधुनिकीकरण व नगरीकरण के प्रभाव को प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है।</p>रचना टम्टा
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3202110.64171/JSRD.5.S3.20-21भारत में उच्च शिक्षा के सकल नामांकन अनुपात की प्रगति का विश्लेषणात्मक अध्ययनः राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में
https://www.dzarc.com/social/article/view/1079
<p>प्रस्तुत शोध पत्र भारत में उच्च शिक्षा के सकल नामांकन अनुपात (GER) की 2014-15 से 2021-22 तक की प्रगति का विश्लेषण करता है। अध्ययन राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 द्वारा निर्धारित 2035 तक 50 प्रतिशत GER के लक्ष्य के संदर्भ में किया गया है। शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा प्रकाशित AISHE की वार्षिक रिपोर्टों के द्वितीयक आंकड़ों के विश्लेषण से ज्ञात होता है कि भारत का कुल GER 2014-15 के 23.7 से बढ़कर 2021-22 में 28.4 हो गया - सात वर्षों में 4.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। अध्ययन लैंगिक समानता, SC/ST वर्गों की भागीदारी तथा 2035 के लक्ष्य की दिशा में वर्तमान प्रगति की गहन समीक्षा प्रस्तुत करता है। निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि जेण्डर पैरिटी इण्डेक्स (GPI) 2021-22 में 1.01 पहुंच गया हैय तथापि SC एवं ST वर्गों का GER राष्ट्रीय औसत से अभी भी क्रमशः 2.5 और 7.2 प्रतिशत कम है। 2035 तक NEP-2020 के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु वर्तमान वृद्धि दर को कम से कम तीन गुना तीव्र करना आवश्यक है।</p>सुविता कुमारी
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3222810.64171/JSRD.5.S3.22-28महिलाओं का विज्ञान के क्षेत्र में योगदान
https://www.dzarc.com/social/article/view/1080
<p>समाज में महिलाओं की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होती है। महिलाएं समाज की रीढ़ होती हैं और विभिन्न क्षेत्रों जैसे परिवार, अर्थव्यवस्था, राजनीति और संस्कृति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। समाज में महिलाओं की भूमिका बहुआयामी होती है जिसमें वे परिवार की देखभाल से लेकर आर्थिक विकास, शिक्षा और सामाजिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। भारतीय इतिहास में कई महिलाओं ने विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए सत्ता में आकर समाज से सम्मान और सम्मान प्राप्त किया है आजादी के बाद महिलाओं का समाज में सम्मान बढ़ा, लेकिन उनके सशक्तिकरण की गति दशकों तक धीमी रही। गरीबी व निरक्षरता महिलाओं की प्रगति में गंभीर बाधा रही हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और कौशल के माध्यम से महिलाओं को व्यवसाय की ओर प्रोत्साहित कर इन्हे आर्थिक रूप से सुदृढ़ किया जा सकता है। 19वीं सदी में महिलाओं ने शिक्षा, स्वास्थ्य और कामकाजी परिस्थितियों जैसे कई क्षेत्रों में सक्रिय रूप से अभियान चलाया। वे महिलाओं के अधिकारों में बदलाव चाहती थीं और लिंगों के बीच समानता स्थापित करना चाहती थीं। यह महिलाओं के इतिहास में एक प्रभावशाली विकास था। 19वीं सदी के अंत तक, नारीवाद को महिलाओं के अधिकारों की वकालत करने वाले व्यक्तियों के एक समूह के रूप में मान्यता मिल गई थी।</p>Praveen Pathak
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3293210.64171/JSRD.5.S3.29-32आत्मनिर्भर भारत और राज्य की भूमिकाः एक राजनीतिक विश्लेषण
https://www.dzarc.com/social/article/view/1082
<p>आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना समकालीन भारतीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और विकास विमर्श में एक केंद्रीय वैचारिक ढाँचे के रूप में उभरकर सामने आई है। वर्ष 2020 में कोविड-19 महामारी की अभूतपूर्व परिस्थितियों के बीच भारत सरकार द्वारा घोषित ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ ने यह स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रीय विकास की प्रक्रिया को केवल वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं और बाहरी निर्भरता के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इस अभियान का उद्देश्य आर्थिक पुनरुत्थान, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा, रोजगार सृजन, तकनीकी एवं औद्योगिक आत्मनिर्भरता तथा राष्ट्रीय आत्मविश्वास के सुदृढ़ीकरण से जुड़ा रहा है। किंतु आत्मनिर्भर भारत को केवल एक तात्कालिक आर्थिक पैकेज या विकासात्मक रणनीति के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह राज्य की भूमिका के पुनर्संरचन से जुड़ी एक व्यापक राजनीतिक और संस्थागत परियोजना भी है।<br>आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा का ऐतिहासिक, वैचारिक और राजनीतिक विश्लेषण करता है। इसमें स्वतंत्रता आंदोलन के स्वदेशी विचार, गांधीवादी आत्मनिर्भरता की अवधारणा, नेहरूवादी नियोजित विकास मॉडल तथा 1991 के बाद के उदारीकरणोत्तर राज्य की भूमिका को आत्मनिर्भर भारत के वर्तमान स्वरूप से जोड़कर समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन यह दर्शाता है कि समकालीन भारत में राज्य की भूमिका केवल नीति-निर्माता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि वह एक कल्याणकारी, नियामक और सहभागी अभिकर्ता के रूप में भी उभर रहा है। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएँ, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रम, डिजिटल शासन, स्टार्ट-अप एवं एमएसएमई को समर्थन तथा केंद्र-राज्य समन्वय इस बदलती भूमिका के महत्वपूर्ण आयाम हैं।<br>आत्मनिर्भर भारत की वास्तविक सफलता सामाजिक न्याय, लोकतांत्रिक सहभागिता और सहकारी संघवाद पर निर्भर करती है। यदि आत्मनिर्भरता की नीतियाँ समाज के कमजोर, हाशिए पर पड़े और वंचित वर्गों को सशक्त बनाने में असफल रहती हैं, तो यह अवधारणा अपने लोकतांत्रिक और नैतिक उद्देश्य से भटक सकती है। साथ ही, वैश्वीकरण के संदर्भ में आत्मनिर्भर भारत को अंतरराष्ट्रीय अलगाव के रूप में नहीं, बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता, संतुलित वैश्विक एकीकरण और राष्ट्रीय हितों की रक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। अंततः यह अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि आत्मनिर्भर भारत तभी सार्थक, समावेशी और टिकाऊ हो सकता है जब राज्य आर्थिक विकास और सामाजिक कल्याण के बीच संतुलन स्थापित करते हुए लोकतांत्रिक मूल्यों, संस्थागत पारदर्शिता और नागरिक सहभागिता को सुदृढ़ बनाए रखे।</p>अर्चना
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3384110.64171/JSRD.5.S3.38-41श्री गंगा जी का प्रदुर्भाव एवं भागीरथी ही गंगा, नाम की स्पष्टता
https://www.dzarc.com/social/article/view/1083
<p>प्रस्तुत प्रपत्र में श्री गंगा जी के उद्गम का समावेश कर गंगा नाम को लेकर जो भ्रामिकता बनी है, उसे स्पष्ट करने पर चर्चा की गई है। गंगा नदी हमारे राष्ट्र की जीवनदायिनी नदी है, जो युगों-युगों से हमें आध्यात्मिक, वैश्विक मूल्यों एवं धर्म, कर्म आदि सभी प्रकार की आस्थाओं से जोड़े हुई है। लेकिन इनके गंगा नाम पर कुछ हद तक भ्रमित किया जा रहा है। वर्तमान समय में लोगों को बताया जा रहा है, कि गंगा देवप्रयाग से बनती है जो कीहमारे पौराणिक शास्त्रों के अनुसार प्रामाणिक नहीं है, पुराणों में को ही गंगा कहा है, जो गौमुख से निकल कर गंगा सागर तक अविरल बह रही है,वही गंगा है। उक्त प्रपत्र द्वारा मुख्य रूप से भागीरथी ही गंगा है। गंगा देवप्रयाग से नहीं बल्कि गौमुख गंगोत्री से उद्धृत है। इस शोध पत्र में मुख्य रूप से स्पष्ट किया जाएगा।</p>आलोक नौटियाल
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2026-05-292026-05-295Special Issue 3424510.64171/JSRD.5.S3.42-45